अ+घोर यानी जो घोर नहीं हो, डरावना नहीं हो, जो सरल हो, जिसमें कोई भेदभाव नहीं हो। कहते हैं कि सरल बनना बड़ा ही कठिन होता है। सरल बनने के लिए ही अघोरी कठिन रास्ता अपनाते हैं।
अघोर विद्या सबसे कठिन वाली विद्या है। साधना के पूर्व मोह-माया का त्याग जरूरी है। अघोरपंथ में श्मशान साधना का विशेष महत्व है। अघोरी जानना चाहता है कि मौत क्या होती है और वैराग्य क्या होता है। आत्मा मरने के बाद कहां चली जाती है? क्या आत्मा से बात की जा सकती है? ऐसे ढेर सारे प्रश्न है जिसके कारण अघोरी श्मशान में वास करना पसंद करते हैं।
श्मशान में तो शिव का वास है उनकी उपासना हमें मोक्ष की ओर ले जाती है।
अघोर को केवल उसके बाहरी स्वरूप से समझना अधूरा है। भस्म और श्मशान के दृश्य ध्यान खींचते हैं, लेकिन वैराग्य, नश्वरता और भेदभाव से परे दृष्टि इस विचार के गहरे प्रश्न हैं।
इस यात्रा में भय को बढ़ाना उद्देश्य नहीं है। उद्देश्य है उन प्रश्नों के निकट जाना जिन्हें हम रोज़मर्रा के जीवन में टाल देते हैं।
किसी परंपरा को समझने की शुरुआत उसके संदर्भ को सुनने से होती है। यह परिचय उसी संवाद का आरंभ है।